Saturday, October 8, 2022

Mrudula Garg Ikkesvin sadi ka ped ek sameeksha # मृदुला गर्ग – इक्कीसवीं सदी का पेड़ की समीक्षा

 मृदुला गर्ग – इक्कीसवीं सदी का पेड़ (समीक्षा)

 

 

समसामयिक विमर्श की कथाकार मृदुला गर्ग की पर्यावरण विमर्श की अनूठी कहानी है इक्कीसवीं सदी का पेड़ | यह कहानी एक वैचारिक और संवेदनशील पर्यावरण समस्या को संबोधित करती है | प्रस्तुत कहानी पेड़ पर्यावरण और मनुष्य के महत्व को प्रस्तुत करती है | प्रकृति की व्यथा कथा को प्रकट करते हुए पर्यावरण का वर्णन करते हैं |

 

पेड़ कुछ कुछ भगवान कि तरह होते हैं | अनाड़ी नहीं, पर अनंत अवश्य|’

 

पेड़ एक जीता जागता सोचने समझनेवाला चरित्र है | दूर देश से आनेवाली चिड़ियाँ उसे वहाँ के विकास तथा पर्यावरण की कथा सुनती है | कई देशों की विध्वंसक पर्यावरण नष्ट की बातें सुनकर पेड़ सहम जाते हैं | लेकिन जब वह सुनता है कि कई देशों में विकास के नाम पर पेड़ों को नहीं काटते – तो उसे अच्छा लगता है | चिड़ियों के मारे जाने कि खबर सुनकर वह उदास हो जाता है | वह ऑक्सिजन देना बंद कर देता है |

 

विदेशी चिड़िया को जवां (जवान) पेड़ ने अपने छितरे पत्तों का कफन ओढ़ रखा था |’

 

लोग अपने पर्यावरण को नष्ट करते हैं | विकास के इस विकृत मॉडल को इक्कीसवीं सदी कहते हैं | उसे यह विनाशपारक मॉडल दिखने लगता है | जानवरों और इनसानों के बीच अंतर दिखाई नहीं देता | प्लास्टिक से पर्यावरण प्रदूषित होता है | पेड़ यह सुनकर दंग रह जाता है जब चिड़िया उसे बताती है कि आज का मनुष्य कैंसर या एड्स से मरने के बीच चुनाव करता है | वह पहचान जाता है कि उसे भी शोर या कचरे के बीच मरने की चुनाव करना पड़ेगा |

लेकिन विडम्बना यह है कि तमाम प्रदूषण, शोर और बढ़ते प्लास्टिक कचरे और शमशानी

वीराने में से पेड़ लगाओ, पर्यावरण बचाओ – के नारे लगाए जाते हैं | यह सुनकर पेड़ हँसता है | पेड़ का हँसना मानवता की ओर कड़ी आलोचना है | इक्कीसवीं सदी की पहली सुबह पेड़ का हँसना बड़ी विडम्बना है | यह हमारे समय और समाज पर तीखा व्यंग्य है |

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