जिनावार चित्रा मुद्गल (समीक्षा)
2018 के प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी
पुरस्कार से सम्मानित आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य की बहुचर्चित लेखिका एवं बाल
साहित्यकार श्रीमती चित्रा मुद्गल की कहानी जिनावर मानव और जानवर के बीच के गहरे
संबंधों का संवेदनात्मक प्रस्तुति है |
प्रकृति
और जानवर मानव जीवन की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं | उन दोनों के उपयोग के बिना मनुष्य रह नहीं सकता | इसलिए हमारे वेद, उपनिषदों और पुराणों ने उनका
सम्मान करना सिखाया | लेकिन आधुनिक दौड़ में शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और बाज़ारूपन ने मनुष्य को और लालची बनाया | उसके स्वार्थ केलिए प्रकृति और
मृगसंपदा पर्याप्त नहीं रहे | अत: उसने इन दोनों का शोषण
शुरू किया | इस वास्तविकता के प्रति पाठकों के दिल और दिमाग
को सजगता प्रदान करना लेखिका का उद्देश्य रहा |
घोड़ी सरवरी और उसका मालिक असलम के बीच एक
गहरा रिश्ता रहा | मानो दोनों
एक दूसरे के बिना कभी पूरे नहीं हो पाते | असलम और सरवरी का
गहरा रिश्ता था –
“आँखें खोलते ही तांगा देखा, लोरी की जगह घोड़े की हिनहिनाहट सुनी |
उन्हीं की तांगों के बीच गुल्ली डंडा खेला |”
उसके अब्बा तांगा चलाते थे | अब्बा के अब्बू तांगा चलाते थे | विकास
के नए दौड़ में असलम ने आगरा का अपना गाँव छोड़ा | दिल्ली की
व्यस्त सड़कों में नई चाहत लेकर उसने घर बसाया | लेकिन घोड़ी
सरवरी अपने मालिक की हर एक ज़रूरत की पूर्ति करती रही | शहरीकरण की दौड़ में
अमीर और अमीर बनता जाएगा और गरीब और गरीब बनता जाएगा |
दिल्ली में आने के बाद भी असलम की समस्याओं में कमी नहीं आई | उसकी पत्नी जुबैदा और आठ बच्चे भूखे के भूखे रहे |
सरवरी के बीमार होने से वह घर और टूट गया | भीषण गरीबी ने
जुबैदा के मुंह से विष उगलवा दिया –
“घोड़ी घोड़ी न हो गयी, रंडी सौत हो गयी मेरी |”
भीषण गरीबी संबंधों में दरार लाती है | वह घोड़ी को बेच देने का आग्रह करती है |
लेकिन असलम अपने प्रिय जिनावर को खोना नहीं चाहता | उसने
उसका इलाज करवाया | सारा घर उसके पीछे फूंकने को राज़ी हो गया
| लेकिन क्या प्रयोजन ?
आजकल की चिकित्सा संप्रदाय पर भी कहानी
तीखा व्यंग्य करती है –
“देशी दवाइयाँ आदमी ही नहीं, अब जिनवारों पर भी बेअसर होने लगी है |
वरना पुरखों ने कौन सुइयां लगवाकर परवरिश की इनकी?”
कहानी में महानगरीय जीवन की
ओर आकृष्ठ निम्नवर्गीय जनता की गरीबी की पराकाष्ठा दिखाई है | जुबैदा का यह कथन उसका उदाहरण है –
“कहो तो अपनी बेटियाँ काटकर चढ़ा दूँ हांडी
में पकने ?”
वह असहाय था | एक ओर भीषण गरीबी और दूसरी ओर अंधकरमय भविष्य | ऐसे में अपनी बीमार घोड़ी को तांगे में बांधने के अलावा असलम के पास और
क्या चारा था |
“ एकाध फेरा हो जाए, सरवरी ! दो रोज़ से चूल्हे में आग नहीं पड़ी|”
एक सवारी की खोज में निकले उसे नौ सवारी
मिल गयी | सरवरी ने उसे निराश नहीं
होने दिया | लेकिन आदमी कभी संतुष्ट नहीं हो सकता | एक के बाद दूसरी होकर उसकी आवश्यकताएँ और इच्छाएं जाग उठती हैं | उसे और सवारी मिल जाती है | वह जिनावर का कष्ट भूल
जाता है | तंग गलियों में चलता हूआ असलम अपने प्रिय जिनावर
को मौत के मुंह में धकेल देता है | उसकी दुर्घटना हो जाती है
|
कार से टक्कर खाकर जब सरवरी गिर जाती है
तो असलम अपना दुखड़ा सुनाने लगता है | पुलिस थाने में वह पैसे की मांग करता है | दो हज़ार रुपये की अच्छी रकम लेकर वह घर चला जाता है |
“सरवरी कहाँ है ? सरवरी यहाँ हो भी कैसे सकती है ? उसे तो
वह वहीं सड़क पर मुर्दा, बेजान। लावारिस छोड़ आया था | नगर पालिका की पशुओं की लाशें ढोनेवाली गाड़ी के भरोसे | कितनी तेज़ी से वह तांगा लेकर भागा था घटनास्थल से |”
स्वार्थता की यह पराकाष्ठा है | उम्र भर मालिक की निस्वार्थ सेवा के बाद भी वह अपनी प्रिय घोड़ी सरवरी को अपनी दयनीय दशा में
छोड़ कर घर की तरफ भागा |
असहाय आदमी यदि निर्लज्ज हो जाए तो
आश्चर्य नहीं है | लेकिन इस
कृतघ्नता में भी असलम का दिल टूट जाता है | वह अपनी पत्नी
जुबैदा से कहता है –
“ये नोट नोट नहीं मेरी सरवरी की बेटियाँ
हैं , बेटियाँ बीवी |”
निष्कर्षत: कहानी जिनावर मनुष्य और जानवर
के गहरे संबंधों के साथ साथ मनुष्य की स्वार्थता, निर्लज्जता और बेबसी की कहानी है | असलम
का अंतिम वाक्य “ये नोट नोट नहीं मेरी सरवरी की बेटियाँ हैं , बेटियाँ बीवी |” उसका प्रायश्चित है | हमारे अमानवीय कृत्यों का कोरा प्रायश्चित | अब
हमारे प्रायश्चित का समय है | यदि हम बची हुई प्रकृति की
रक्षा करने में सफल नहीं हुए तो आगे आनेवाला समय कदापि हमें माफ नहीं करेगा | जिनावर कहानी की ओर से श्रेमती चित्रा मुद्गल की यह याद दिलाना और चेतावनी
भी है |