बटरोही – कहीं दूर जब दिन ढल जाए
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ग्रामीण सौंदर्य और शालीनता के कथाकार
श्री बटरोही की रचना कहीं दूर जब दिन ढल जाए कहानी संस्मरण के दायरे में आती है | लेखक अपनी बुआ से मिलने पहाड़ स्थित गाँव – बसोली – जाता है | वहाँ का वातावरण शहरों से भिन्न है | नैसर्गिक और
संवेदन शील |
उनकी भाषा प्यार की भाषा थी –
‘देहात में रहनेवाली अनपढ़ बुआ तो सिर्फ एक ही भाषा जानती थी – स्पर्श की भाषा | उसकी आँखों से निरंतर आँसू बह रहे
थे |’
कुत्ते बिल्ली पक्षी साँप आदि उस जीवन का अंग है
| वाहन तेज़ बारिश होती है | घंटे भर में धरती की मिट्टी कीचड़ बन जाती है | फिर
आकाश का एक कोना खुल जाता है और उस कोने से छनकर सूरज की किरणें बुआ के घर को
स्वर्णिम रंग प्रदान करती है | जब बुआ का मन प्यार से
प्लावित होने लगता है तो उनके मुंह से एक आदिम शब्द फूट पड़ता है
दिग्गौ ......
कुछ शब्द अजीब होते हैं जिंका कोई अर्थ
नहीं होता | लेकिन वह एक
संस्कृति का परिचय देता है | पीढ़ियों को पार कर पहाड़ों को
पार कर वह शब्द हमारे सामने कई प्रश्न खड़े करते हैं ? क्या
आज भी हम उस संस्कृति को याद करते हैं ?
बुआ के घर में कुत्ते बिल्ली साँप आदि
जानवर बड़े प्यार से रहते हैं | अनाज के बीच
कुत्ते का स्थान था और पश्चिमी कोना बिल्ली का | चबूतरे की
बीच रेंगता हुआ लंबा काला साँप हमें ग्रामीण संस्कृति के निर्लोभ प्यार का परिचय
कराता है | बुआ कहती है –
“भगवान का वरदान होता है -साँप कीड़ों में”
निष्कर्षत: श्री बटरोही की रचना कहीं दूर
जब दिन ढल जाए मानवीय स्पर्श को आत्मा में उतारने की कहानी है | देहातों की भाषा, आत्मीयता और निष्कपटता
के सौन्दर्य का वर्णन है | ग्रामीण संस्कारों में हर एक की
स्वीकृति है | प्रकृति, कुत्ते, बिल्ली, साँप सबका अपना महत्व है | वहाँ सबका अनोखा समन्वय है जिससे हमारी शहरी संस्कृति वंचित है |
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