Saturday, October 8, 2022

jinavar chitra mudgal sameeksha जिनावार चित्रा मुद्गल (समीक्षा)

 

जिनावार चित्रा मुद्गल (समीक्षा)

2018 के प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य की बहुचर्चित लेखिका एवं बाल साहित्यकार श्रीमती चित्रा मुद्गल की कहानी जिनावर मानव और जानवर के बीच के गहरे संबंधों का संवेदनात्मक प्रस्तुति है |

 

                  प्रकृति और जानवर मानव जीवन की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं | उन दोनों के उपयोग के बिना मनुष्य रह नहीं सकता | इसलिए हमारे वेद, उपनिषदों और पुराणों ने उनका सम्मान करना सिखाया | लेकिन आधुनिक दौड़ में शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और बाज़ारूपन ने मनुष्य को और लालची बनाया | उसके  स्वार्थ केलिए प्रकृति और मृगसंपदा पर्याप्त नहीं रहे | अत: उसने इन दोनों का शोषण शुरू किया | इस वास्तविकता के प्रति पाठकों के दिल और दिमाग को सजगता प्रदान करना लेखिका का उद्देश्य रहा |

घोड़ी सरवरी और उसका मालिक असलम के बीच एक गहरा रिश्ता रहा | मानो दोनों एक दूसरे के बिना कभी पूरे नहीं हो पाते | असलम और सरवरी का गहरा रिश्ता था

 

“आँखें खोलते ही तांगा देखा, लोरी की जगह घोड़े की हिनहिनाहट सुनी | उन्हीं की तांगों के बीच गुल्ली डंडा खेला |”

 

उसके अब्बा तांगा चलाते थे | अब्बा के अब्बू तांगा चलाते थे | विकास के नए दौड़ में असलम ने आगरा का अपना गाँव छोड़ा | दिल्ली की व्यस्त सड़कों में नई चाहत लेकर उसने घर बसाया | लेकिन घोड़ी सरवरी अपने मालिक की हर एक ज़रूरत की पूर्ति करती रही  | शहरीकरण की दौड़ में अमीर और अमीर बनता जाएगा और गरीब और गरीब बनता जाएगा | दिल्ली में आने के बाद भी असलम की समस्याओं में कमी नहीं आई | उसकी पत्नी जुबैदा और आठ बच्चे भूखे के भूखे रहे | सरवरी के बीमार होने से वह घर और टूट गया | भीषण गरीबी ने जुबैदा के मुंह से विष उगलवा दिया

 

“घोड़ी घोड़ी न हो गयी, रंडी सौत हो गयी मेरी |

 

भीषण गरीबी संबंधों में दरार लाती है | वह घोड़ी को बेच देने का आग्रह करती है | लेकिन असलम अपने प्रिय जिनावर को खोना नहीं चाहता | उसने उसका इलाज करवाया | सारा घर उसके पीछे फूंकने को राज़ी हो गया | लेकिन क्या प्रयोजन ?

आजकल की चिकित्सा संप्रदाय पर भी कहानी तीखा व्यंग्य करती है –

 

“देशी दवाइयाँ आदमी ही नहीं, अब जिनवारों पर भी बेअसर होने लगी है | वरना पुरखों ने कौन सुइयां लगवाकर परवरिश की इनकी?”

 

कहानी में महानगरीय जीवन की ओर आकृष्ठ निम्नवर्गीय जनता की गरीबी की पराकाष्ठा दिखाई है | जुबैदा का यह कथन उसका उदाहरण है –

 

“कहो तो अपनी बेटियाँ काटकर चढ़ा दूँ हांडी में पकने ?”

वह असहाय था | एक ओर भीषण गरीबी और दूसरी ओर अंधकरमय भविष्य | ऐसे में अपनी बीमार घोड़ी को तांगे में बांधने के अलावा असलम के पास और क्या चारा था |

 

“ एकाध फेरा हो जाए, सरवरी ! दो रोज़ से चूल्हे में आग नहीं पड़ी|”

एक सवारी की खोज में निकले उसे नौ सवारी मिल गयी | सरवरी ने उसे निराश नहीं होने दिया | लेकिन आदमी कभी संतुष्ट नहीं हो सकता | एक के बाद दूसरी होकर उसकी आवश्यकताएँ और इच्छाएं जाग उठती हैं | उसे और सवारी मिल जाती है | वह जिनावर का कष्ट भूल जाता है | तंग गलियों में चलता हूआ असलम अपने प्रिय जिनावर को मौत के मुंह में धकेल देता है | उसकी दुर्घटना हो जाती है |

कार से टक्कर खाकर जब सरवरी गिर जाती है तो असलम अपना दुखड़ा सुनाने लगता है | पुलिस थाने में वह पैसे की मांग करता है | दो हज़ार रुपये की अच्छी रकम लेकर वह घर चला जाता है |

“सरवरी कहाँ है ? सरवरी यहाँ हो भी कैसे सकती है ? उसे तो वह वहीं सड़क पर मुर्दा, बेजान। लावारिस छोड़ आया था | नगर पालिका की पशुओं की लाशें ढोनेवाली गाड़ी के भरोसे | कितनी तेज़ी से वह तांगा लेकर भागा था घटनास्थल से |”

 

स्वार्थता की यह पराकाष्ठा है | उम्र भर मालिक की निस्वार्थ सेवा के बाद भी वह  अपनी प्रिय घोड़ी सरवरी को अपनी दयनीय दशा में छोड़ कर घर की तरफ भागा |

असहाय आदमी यदि निर्लज्ज हो जाए तो आश्चर्य नहीं है | लेकिन इस कृतघ्नता में भी असलम का दिल टूट जाता है | वह अपनी पत्नी जुबैदा से कहता है –

 

“ये नोट नोट नहीं मेरी सरवरी की बेटियाँ हैं , बेटियाँ बीवी |”

 

निष्कर्षत: कहानी जिनावर मनुष्य और जानवर के गहरे संबंधों के साथ साथ मनुष्य की स्वार्थता, निर्लज्जता और बेबसी की कहानी है | असलम का अंतिम वाक्य “ये नोट नोट नहीं मेरी सरवरी की बेटियाँ हैं , बेटियाँ बीवी |” उसका प्रायश्चित है | हमारे अमानवीय कृत्यों का कोरा प्रायश्चित | अब हमारे प्रायश्चित का समय है | यदि हम बची हुई प्रकृति की रक्षा करने में सफल नहीं हुए तो आगे आनेवाला समय कदापि हमें माफ नहीं करेगा | जिनावर कहानी की ओर से श्रेमती चित्रा मुद्गल की यह याद दिलाना और चेतावनी भी है | 

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